एक बार स्वामीनारायण संप्रदाय के स्थापक श्री सहजानंद स्वामी को मिलने दीनानाथ भट्ट नामक संस्कृत के प्रखर ज्ञानी मिलने के लिए आये। उनकी पंडिताई के आगे अछे भले लोग पानी कम थे। संस्कृत के इतने श्लोक इनको कंटस्थ के जिसको गिनना मुश्किल था। उनके सामने वाद विवाद करना किसी का बस नथी था। आसे पंडितजी का आदर सत्कार किया और उनसे पूछा " आप तो संस्कृत के प्रखर ज्ञानी हो आपकी विद्वानता का चारो और चर्चा होता है। आप की यादशक्ति अद्भूत है। तो मैं आप को एक प्रशन पुछू?"
" पूछिए पूछिए जरुर पूछिए। " शास्त्री दीनानाथ भट्ट को यह हुआ की स्वामी जी उनिकी परीक्षा करना चाहते है । श्री सहजानंद स्वामी ने पूछा "आपको कितने श्लोक कंठस्त है ?"
पंडित दीनानाथ भट्ट ने जवाब दिया " पुरे अट्ठार हजार ! आप कहो तो गाके सुना दू ।"
श्री शाजनानद स्वामीने प्रशन किया : " मुझे श्लोक सुनने नहीं है लेकिन मुझे आपके पास से ये जानना है के इस अट्ठार हजार श्लोकमैं से कोनसा श्लोक मुझे मोक्ष दिलाने मैं मददरूप बनेगा ?"
पंडितजी तो घेरी सोच मैं पड़ गए। उन्होंने तो आज दिन तक आसे श्लोक के के बारे मी कभी नहीं सोचा था, मोक्ष का नहीं । उस कारन उन्होंने कहा : " हे ! स्वामीजी ! उसकीतो मैंने कभी गिनती ही नहीं की। उसका हिसाब तो मैं कभी सुरु ही नहीं किया है "
" तो फिर इतने सरे श्लोक याद रखने का क्या अर्थ ? वसे तो रटाया हुआ तो पालतू पोपट भी बोल लेता है ? जो शास्र मुक्ति न दिलाये उसका आभियास किस काम का ? उससे तो आत्मा का कल्याण थोड़ी न होता है ? ज्ञानके सागर सामान पंडित दीनानाथजी को स्वामीजी की बात समाज मैं आ गई।
येः गटना गहन चिंतन जगती है । समाज मैं सामान्यत एसा देखनो को मिलता है के जो इन्सान रामायण और भगवदगीता के श्लोक कंठस्त बोल जाता है वो धर्मपुरुष कहलाता है। सभी धर्म कम या जयादा एसा देखनो को मिलता है की उसमे आने वाले कंठस्थ बोलने वाले को संत का सम्मान दिया जाता है। बल्कि हकीकत येही है के आपनी याददास्त के कारन एसा करने वाले इस्सन को धर्मपुरुष कहाजा सकता है? शास्त्र के शास्त्र कंठस्थ बोलने वाले को ज्ञानी गिना जा सकता है? इसी याददास्त के पीछे उस इन्सान को ज्ञान का आनुभव होता नहीं है।
शास्त्र कंठस्थ करने की विद्या नहीं है , वो तो सत्य के मार्ग पर चलने का रास्ता है हकीकत तो येः है। असी रीत से श्रीमद भगवद बोलने वाले को वास्तव मैं महाज्ञानी गिना जाना चाहिए? के इसी शक्ति उसकी अज्ञानता को नादारान्दाज करने मैं सहायभूत गिनाजाये ?
हकीकत तो येः है की इस इन्सान का अज्ञान अज्ञान ही रह जाता है । शास्त्रके शब्द के तक ही वो सिमित रहता है। वो शब्द उसके भीतर तक नहीं होते। इतना ही नहीं उससे भीतर मैं कोई नया ज्ञान का प्रकाश होता नहीं। वो शिर्फ़ शब्द पकड़ के रखते है और उसे अपपनी सुमूर्ति मैं रखते है और जररूत पर वोही शब्द स्मुर्ती मैं से भर निकलते है इसलिए इसमें ज्ञानशक्ति की वजह सुमूर्तिशक्ति की महिमा होती है
धर्म शास्त्र याद रखने से या उसे मैं लिखे हुए सिद्धांत बोले जाने से कुछ हासिल होता नहीं है धर्म के लिए शब्द तो शिर्फ़ भिया आवरण है उस का देः वो शब्द का अर्थ है आने एशासस वो उस का हार्ट है मात्र शब्द पकड़ के चलनार के फिर कोई कवि की तरह शब्द के साथ खेलनार उसके रहस्य को पमता नहीं है। कभी स्थूल शब्द इसे पकड़ा जाता है के उस शब्द का अर्थ के जगह अनर्थकारी बन जाता है । बल्कि सिर्फ शबेद्ज्ञान और अनुभव के साथ कुछ भी संबध नहीं है धर्म के तत्त्व के साथ उसका कोई संबध नहीं है धर्म शास्त्र का रटारटाया उच्चारण करनार अपने आपको धार्मिक मान लेते है और मानव समूह भी उनकी सुमूर्ति शक्ति को धर्मोपंसना का शिकार मानते है। बल्कि सुमुती शक्ति के जोर पर काम करने से इसन कभी भी ज्ञानी बनता नहीं है उसे से जयादा उसे की इस शक्ति के कारन अहंकारी बनजाता है। इसे इन्सान को दो प्रकारसे नुकशान जाता है एक तो ज्ञान से दूर रहता है और दूसरा अपने आपको परम ज्ञानी मानने की भांति होती है। सुमूर्ति शक्ति के खेलको पहेले समजना चाहिए आपको याद रखने की शक्ति बचपन से ही मिली हुई होती है किन्तु , धर्म के शास्त्र इसी रित से याद रखनार वो सिर्फ स्कूल मैं इंग्लिश के स्पलिंग या भूमिति के सिद्धांत को जानने वाला ही होता है इसका अर्थ येः है की इन्सान आपनी याददास्त बढाकर माहिती संचय करता है उसकी स्मरण शक्ति बराबर बढ शक्ति है
बल्कि आज समाज मैं वेद गीता बोल जाने वाले इन्सान की अति महिमा है जो वक्ती वेद बोलता है उसने उसकी सुमुती मैं वेद के बदले सूफी कविता राखी हॉट तो वो सूफी कवित बोलता होता इसतरह सुमुती का काम टेप जेसा होता है आप जेसे टेप मैं रिकॉर्ड करते है उसी प्रकार वो बजता है उसी सुमुती शक्ति के आधार पर शास्त्र बोलती वयक्ति सरलता और विनम्रता गवाके अपने आप को दुसरो से ऊँचा मानने लगता है। वो आपने आप को ज्ञानी पंडित मानने लगता है और उसके परिणाम स्वरुप उसकी सुमुती उसको गलत राह पर ले जाती है।
वसे तो मानवी की सुमुती शक्ति यन्त्ररूप है । यन्त्र मैं जो डालो वो प्रगट होता है जो आप ने धर्म्वेद के श्लोक डाले हुए है तो वो प्रगट होगा और आप किसी भगवान् को सत्य भी प्रगट भी kनास्तिक के बोल रखे होगे तो वो भी इसी पारकर परगट होगे इस लिए इसे संग्रह व्यक्ति के चितको आग्वी शक्ति मैं जोड़ने की जरुरत है धर्म के साथ नहीं जो उसके पास ज्ञान का प्रकाश होता तो वो विनम्र बन सकता था बलकी ज्ञान प्रकाश के आभाव और धर्म की सही सूज के आभाव के कारन उसका अहंकार जयादा से जयादा बहेकता जाता है उसी कारन वो व्यक्ति आपनी शारीर को जयादा से जयादा हानि करती है
इस प्रकार धर्मग्रन्थ को कंठस्थ करने से इन्सान के हिरदय मैं कुछ परिवतन होता नहीं है हा येः इतना सच है के धर्मग्रन्थ के गान से दिखावा करसकता है परन्तु उनका भीतर खाली होता है इस प्रकार उनका हदय किसी भी प्रकार की अनुभूति प्राप्त कर नहीं सकता उसके ज्ञान का गर्व उसकी अज्ञानता की दशा मैं वुर्द्धि करता है
एक दूसरी बाबत का महत्व येः हे की शास्त्र के श्लोक या परिच्छेद किसी और के रचे हुए है उसके पीछे याद रखने वाली व्यक्तिकी बरसो की साधना अनुभव का निचोड़ की गहन अनुभूति होती नहीं है उसे मुख्पाथ और उसे बोल जाने वाले व्यक्ति के जीवन मैं वो शब्द होते नहीं है उस के पीछे चिंतन या नेकदिल आचरण होता नहीं है जब आप शास्त्र को प्राप्त करते हो तब उसे की गेहराई मैं रहा हुआ सत्य भी प्राप्त करना चाहिए अगर आप सत्य को नहीं पामते हो तो आप उसकी सिर्फ सुमुती रखनेवाले कहलाओगे लकिन आप को कोई ज्ञानी पुरुष नहीं कहेगा शब्द के माध्यम से जगती अध्यात्मिक पिपासा की बात तो दूर की रही शबेद्ज्ञानी शास्त्रज्ञानी कहा नहीं जा सकता और शास्त्रज्ञानी को शब्दज्ञानी कहा नहीं जा सकता
दोनों मैं यह भेद समाज लेना जरुरी है नहीं तो मात्र कंठस्थ ज्ञान प्राप्त करनार उठ्स्क्रुथज्ञानी और पर्धर्मी कहलायेगा और फिर शब्द का पोपत्ज्ञान वो उसके लिए शापरूप बनके रहेगा
ज्ञानिनी अनुभूति अत्यंत विलक्षण है कफिबर वो शब्द मैं पकड़ मैं नहीं आती आखाने कहा है " बावन बाहेर " की बात है और उसे से फकत शब्द से मर्म , अर्थ के धर्म दिए नहीं जा सकते इस लिए कबीरने स्थुड शब्द और अनुभूतिपूर्ण शब्द का भेद दिखाते हुए कहा है की
"शब्द शब्द बहु अंतरा , सार शब्द चित देय,
जा शब्दे साहेब मिले, सौई शब्द गहे लए,
" पूछिए पूछिए जरुर पूछिए। " शास्त्री दीनानाथ भट्ट को यह हुआ की स्वामी जी उनिकी परीक्षा करना चाहते है । श्री सहजानंद स्वामी ने पूछा "आपको कितने श्लोक कंठस्त है ?"
पंडित दीनानाथ भट्ट ने जवाब दिया " पुरे अट्ठार हजार ! आप कहो तो गाके सुना दू ।"
श्री शाजनानद स्वामीने प्रशन किया : " मुझे श्लोक सुनने नहीं है लेकिन मुझे आपके पास से ये जानना है के इस अट्ठार हजार श्लोकमैं से कोनसा श्लोक मुझे मोक्ष दिलाने मैं मददरूप बनेगा ?"
पंडितजी तो घेरी सोच मैं पड़ गए। उन्होंने तो आज दिन तक आसे श्लोक के के बारे मी कभी नहीं सोचा था, मोक्ष का नहीं । उस कारन उन्होंने कहा : " हे ! स्वामीजी ! उसकीतो मैंने कभी गिनती ही नहीं की। उसका हिसाब तो मैं कभी सुरु ही नहीं किया है "
" तो फिर इतने सरे श्लोक याद रखने का क्या अर्थ ? वसे तो रटाया हुआ तो पालतू पोपट भी बोल लेता है ? जो शास्र मुक्ति न दिलाये उसका आभियास किस काम का ? उससे तो आत्मा का कल्याण थोड़ी न होता है ? ज्ञानके सागर सामान पंडित दीनानाथजी को स्वामीजी की बात समाज मैं आ गई।
येः गटना गहन चिंतन जगती है । समाज मैं सामान्यत एसा देखनो को मिलता है के जो इन्सान रामायण और भगवदगीता के श्लोक कंठस्त बोल जाता है वो धर्मपुरुष कहलाता है। सभी धर्म कम या जयादा एसा देखनो को मिलता है की उसमे आने वाले कंठस्थ बोलने वाले को संत का सम्मान दिया जाता है। बल्कि हकीकत येही है के आपनी याददास्त के कारन एसा करने वाले इस्सन को धर्मपुरुष कहाजा सकता है? शास्त्र के शास्त्र कंठस्थ बोलने वाले को ज्ञानी गिना जा सकता है? इसी याददास्त के पीछे उस इन्सान को ज्ञान का आनुभव होता नहीं है।
शास्त्र कंठस्थ करने की विद्या नहीं है , वो तो सत्य के मार्ग पर चलने का रास्ता है हकीकत तो येः है। असी रीत से श्रीमद भगवद बोलने वाले को वास्तव मैं महाज्ञानी गिना जाना चाहिए? के इसी शक्ति उसकी अज्ञानता को नादारान्दाज करने मैं सहायभूत गिनाजाये ?
हकीकत तो येः है की इस इन्सान का अज्ञान अज्ञान ही रह जाता है । शास्त्रके शब्द के तक ही वो सिमित रहता है। वो शब्द उसके भीतर तक नहीं होते। इतना ही नहीं उससे भीतर मैं कोई नया ज्ञान का प्रकाश होता नहीं। वो शिर्फ़ शब्द पकड़ के रखते है और उसे अपपनी सुमूर्ति मैं रखते है और जररूत पर वोही शब्द स्मुर्ती मैं से भर निकलते है इसलिए इसमें ज्ञानशक्ति की वजह सुमूर्तिशक्ति की महिमा होती है
धर्म शास्त्र याद रखने से या उसे मैं लिखे हुए सिद्धांत बोले जाने से कुछ हासिल होता नहीं है धर्म के लिए शब्द तो शिर्फ़ भिया आवरण है उस का देः वो शब्द का अर्थ है आने एशासस वो उस का हार्ट है मात्र शब्द पकड़ के चलनार के फिर कोई कवि की तरह शब्द के साथ खेलनार उसके रहस्य को पमता नहीं है। कभी स्थूल शब्द इसे पकड़ा जाता है के उस शब्द का अर्थ के जगह अनर्थकारी बन जाता है । बल्कि सिर्फ शबेद्ज्ञान और अनुभव के साथ कुछ भी संबध नहीं है धर्म के तत्त्व के साथ उसका कोई संबध नहीं है धर्म शास्त्र का रटारटाया उच्चारण करनार अपने आपको धार्मिक मान लेते है और मानव समूह भी उनकी सुमूर्ति शक्ति को धर्मोपंसना का शिकार मानते है। बल्कि सुमुती शक्ति के जोर पर काम करने से इसन कभी भी ज्ञानी बनता नहीं है उसे से जयादा उसे की इस शक्ति के कारन अहंकारी बनजाता है। इसे इन्सान को दो प्रकारसे नुकशान जाता है एक तो ज्ञान से दूर रहता है और दूसरा अपने आपको परम ज्ञानी मानने की भांति होती है। सुमूर्ति शक्ति के खेलको पहेले समजना चाहिए आपको याद रखने की शक्ति बचपन से ही मिली हुई होती है किन्तु , धर्म के शास्त्र इसी रित से याद रखनार वो सिर्फ स्कूल मैं इंग्लिश के स्पलिंग या भूमिति के सिद्धांत को जानने वाला ही होता है इसका अर्थ येः है की इन्सान आपनी याददास्त बढाकर माहिती संचय करता है उसकी स्मरण शक्ति बराबर बढ शक्ति है
बल्कि आज समाज मैं वेद गीता बोल जाने वाले इन्सान की अति महिमा है जो वक्ती वेद बोलता है उसने उसकी सुमुती मैं वेद के बदले सूफी कविता राखी हॉट तो वो सूफी कवित बोलता होता इसतरह सुमुती का काम टेप जेसा होता है आप जेसे टेप मैं रिकॉर्ड करते है उसी प्रकार वो बजता है उसी सुमुती शक्ति के आधार पर शास्त्र बोलती वयक्ति सरलता और विनम्रता गवाके अपने आप को दुसरो से ऊँचा मानने लगता है। वो आपने आप को ज्ञानी पंडित मानने लगता है और उसके परिणाम स्वरुप उसकी सुमुती उसको गलत राह पर ले जाती है।
वसे तो मानवी की सुमुती शक्ति यन्त्ररूप है । यन्त्र मैं जो डालो वो प्रगट होता है जो आप ने धर्म्वेद के श्लोक डाले हुए है तो वो प्रगट होगा और आप किसी भगवान् को सत्य भी प्रगट भी kनास्तिक के बोल रखे होगे तो वो भी इसी पारकर परगट होगे इस लिए इसे संग्रह व्यक्ति के चितको आग्वी शक्ति मैं जोड़ने की जरुरत है धर्म के साथ नहीं जो उसके पास ज्ञान का प्रकाश होता तो वो विनम्र बन सकता था बलकी ज्ञान प्रकाश के आभाव और धर्म की सही सूज के आभाव के कारन उसका अहंकार जयादा से जयादा बहेकता जाता है उसी कारन वो व्यक्ति आपनी शारीर को जयादा से जयादा हानि करती है
इस प्रकार धर्मग्रन्थ को कंठस्थ करने से इन्सान के हिरदय मैं कुछ परिवतन होता नहीं है हा येः इतना सच है के धर्मग्रन्थ के गान से दिखावा करसकता है परन्तु उनका भीतर खाली होता है इस प्रकार उनका हदय किसी भी प्रकार की अनुभूति प्राप्त कर नहीं सकता उसके ज्ञान का गर्व उसकी अज्ञानता की दशा मैं वुर्द्धि करता है
एक दूसरी बाबत का महत्व येः हे की शास्त्र के श्लोक या परिच्छेद किसी और के रचे हुए है उसके पीछे याद रखने वाली व्यक्तिकी बरसो की साधना अनुभव का निचोड़ की गहन अनुभूति होती नहीं है उसे मुख्पाथ और उसे बोल जाने वाले व्यक्ति के जीवन मैं वो शब्द होते नहीं है उस के पीछे चिंतन या नेकदिल आचरण होता नहीं है जब आप शास्त्र को प्राप्त करते हो तब उसे की गेहराई मैं रहा हुआ सत्य भी प्राप्त करना चाहिए अगर आप सत्य को नहीं पामते हो तो आप उसकी सिर्फ सुमुती रखनेवाले कहलाओगे लकिन आप को कोई ज्ञानी पुरुष नहीं कहेगा शब्द के माध्यम से जगती अध्यात्मिक पिपासा की बात तो दूर की रही शबेद्ज्ञानी शास्त्रज्ञानी कहा नहीं जा सकता और शास्त्रज्ञानी को शब्दज्ञानी कहा नहीं जा सकता
दोनों मैं यह भेद समाज लेना जरुरी है नहीं तो मात्र कंठस्थ ज्ञान प्राप्त करनार उठ्स्क्रुथज्ञानी और पर्धर्मी कहलायेगा और फिर शब्द का पोपत्ज्ञान वो उसके लिए शापरूप बनके रहेगा
ज्ञानिनी अनुभूति अत्यंत विलक्षण है कफिबर वो शब्द मैं पकड़ मैं नहीं आती आखाने कहा है " बावन बाहेर " की बात है और उसे से फकत शब्द से मर्म , अर्थ के धर्म दिए नहीं जा सकते इस लिए कबीरने स्थुड शब्द और अनुभूतिपूर्ण शब्द का भेद दिखाते हुए कहा है की
"शब्द शब्द बहु अंतरा , सार शब्द चित देय,
जा शब्दे साहेब मिले, सौई शब्द गहे लए,
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